चाँद की तरह तुम भी ना कभी ठहरो पूरी रात सनम, बिन तुम्हारे लगती है ये रात,अधूरी रात सनम। इतनी भी क्या नाराज़गी हुई, गुस्सा छोड़ो भी कभी अनजाने में ही करलो थोड़ी हमसे बात सनम जमीं से फलकं तक, तुम्हे लेकर जाना है कभी ख्वाबों में ही सही, कर लो हमसे मुलाकात सनम हिज्र का मंजर दे दो या गम से भरा सागर दे दो, मै मरते दम तक चाहूंगी, बस तुम्हारा फरहात सनम। एक भी कांटे दिख जाये गर राहों में तुम्हारी कदमों के नीचे मै तेरे रख दुंगी अपने हाथ सनम मोहब्बत के सिवा कभी कुछ मांगा नहीं मैंने काश तुमने भी दिया होता मेरा ऐसे साथ सनम जिसके नाम के साथ कभी मशहूर हुआ करते थे तुम उसी को आज क्यों बता दिया तुमने ऐसे अज्ञात सनम यु किसी हस्ते हुए को रुलाने का हुनर अच्छा है सब खुश है, मुझको भी पढ़ा दो ये पाठ सनम तन्हाई का वो कैसा हुआ करता था आलम सुनकर तुम बिखर जाओगे, मेरे हालात सनम एक रोज़ तुम भी कभी, तन्हा बैठो जाना निक्की पे गुज़री, बतायेंगी यादो की बारात सनम
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ऐसा क्या हुआ हमसे बिछड़ के की तुम अपनी हंसी भूल गए बेदीली मेरी नहीं थी,फिर क्यों अपनी खुशी भूल गए परायों को तो क्या खूब याद रखा है तुमने जो अपने थे,यार तुम वही भूल गए अरसे हो गए दीदार ए हुस्न किए तेरे शहर में तो हो पर क्या मेरी गली भूल गए अब तुझ से ज्यादा मोहब्बत वापस तुझ से भी नहीं होगी पर तुम उस रकीब के आते ही मेरी कमी भूल गए और क्या कहते थे,की इश्क़ ईमान से बंधा होता है ऐसे रुख मोड़ा तुमने,लगा तुम अपनी ज़मीर भूल गए कभी मेरी हथेलियों को मिलाते थे अपनी हथेली से शायद अब मेरे साथ लिखी वो तकदीर भूल गए और पहले तो पाकिस्तान से लड़ लिया करते थे हमसे ऐसा क्या हो गया कि तुम अपनी कश्मीर भूल गए तेरी याद आज भी मुझे रात में घंटों जगाती है पर कोई पूछे तो के दुंगी, यार हीं भूल गए