Tafkkur atit ka
तफक्कुर अतीत का
अनायास अलार्म के बजने पर शेखर की नींद खुली,वो भी मिट्टी के भिनी खुशबू के साथ। हां,दिल्ली की भाग दौड़ से दूर शेखर 8 साल बाद छुट्टी में अपने जन्मज गांव आया था।वो गांव जहां उसने कितने सपने संजोए थे,अपनी ज़िन्दगी के कितने बेहतरीन पल गुजारे थे,वो नदी का किनारा,वो आम का पेड़ आज भी कितना साफ दिख रहा था शेखर के आंखों को जैसे कि ये सब कल ही हुआ हो।
अपनी पुरानी चीजें देखते देखते सहसा शेखर अपने किताबों कि दराज के पास पहुंचा,धूल की चादर ओढ़े वो किताबें कब से शेखर की राह देख रही थी। सबसे ऊपर थी इतिहास की किताब,सब किताबों से अलग और चमकीले पेन से उस पर नाम लिखा था ' इवा '।बस ये नाम काफी था वो सारी मीठी यादें उड़ेलने के लिए जिसे शेखर का मन आजतक नहीं भूल पाया था।वो शाम की चाय,जो वो दोनों साथ में पिया करते थे और कितनी खट्टी मीठी बातें किया करते थे।वो सारे ख्वाबों ने भी शेखर के मन को एक झटके में झकझोर दिया था जो इवा और शेखर ने साथ बुने थे,वो छोटा सा घर जिसके बगीचे में कमलतास के वृक्ष इंतजार करते रहते उन दोनों के गुफ्तगू के,एक बाइक और एक दूसरे के लिए ढेर सारा वक्त। फिर ना जाने क्यूं इस प्यार के सूर्य को नकारात्मकता का ग्रहण लग गया।आज भी तारीख याद है उसे 11 फरवरी,सब कुछ आम दिनों के तरह ही था,बस वो काली शाम के वो शब्द आज भी जब उसके मस्तिष्क में कौंधते है,तो पूरे तन में लहू आग सा दौड़ने लगता है।
इवा ने कहा था - " बस शेखर,मेरा मन अब तुमसे भर गया"
मन भर गया,अरे इंसान कोई वस्तु मात्र थोड़ी है जो मन भर जाए,शेखर आज भी वही बुदबुदा रहा था।बहुत प्रयास किए थे उसने इवा को वापस पाने के पर सब विफल रहे,वो कैसे समझाता उसे की इश्क़ कभी बासी नहीं होता।अगले दिन इवा की मां ने उसे वो इतिहास की किताब दी थी और कहा था," इवा चली गई"।
रोष और अहंकार में लिपटे शेखर ने किताब को देखा भी नहीं,आज वो किताब उस के हाथों खुली थी।अभी वो इवा को ग्लानि के सागर में डूबा ही रहा था कि एक कागज उस किताब से निकाल जमीं पर गिर पड़ा।शेखर ने जब उठाया तो देखा तो वो एक खत था शेखर के नाम पर,इवा का।
प्रिय शेखर,
मैं जानती हूं कि कल जो हुआ उस बात की तुम्हें बहुत वेदना होगी, पर तुम समझो मेरे लिए ऐसा करना आवश्यक था,ना मेरा तुमसे मन भरा है और ना तुमसे कोई गलती हुई है। शेखर,तुम कहां एक गगन में अपने ख्वाब लिए उड़ते उन्मुक्त युवक हो और मै यहां इतनी सरल और पाबंद सोच वाली लड़की।मै खुद को तुम्हारे काबिल नहीं समझती शेखर,पर तुम्हे ये समझाना बहुत जटिल होता,सो मैंने ऐसा किया।हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।
तुम्हारी इवा
खत में लिखे इवा के नाम को अभी तक शेखर के अश्कों ने सुशोभित कर दिया था।शेखर का मन उन्माद और प्रेम के अथाह समुद्र में गोता लगा चुका था।वो पागलों की तरह इवा को हर जगह ढूंढने लगा,और वो खुद से बातें करता," इवा पागल है,अरे भला जिस किस्मत पर इंसान भगवान से तर्क करने पे उतर जाता है,उस किस्मत का कर्णधार वो खुद को कैसे बना सकती है "।और कभी खुद को दोषी ठहराता की खुद की अहंकार पूर्ति के लिए उसने इवा को इतनी आसानी से जाने दिया।खैर,काफी जद्दजहद के बाद इवा का पता मिलने पर वो उस से मिलने गया।वैसा ही सरल मुख, वैसी ही निर्मल काया,बिल्कुल नहीं बदली थी इवा,शेखर ने बोलना चाहा - "ई...." लेकिन उसकी जुबान लड़खड़ा गई। आंखों ने ही तब तक काफी कुछ कह दिया था।वो सपने जो उसने पहले इवा के साथ देखे थे,आज फिर उसके मन में संजोए जा रहे थे।
तभी एक नन्ही आवाज़ सुनाई पड़ी -" मां,ये अंकल कौन है ",और एक 4-5 साल का बच्चा घर से बाहर निकला,काफी था ये 'मां' शब्द,शेखर के ख्वाबों के नवनिर्मित पुल को विध्वंस करने के लिए। अभी तक जो कारण इवा के आंखों को भीगा रहे थे,वो शायद शेखर तक पहुंच चुके थे,शेखर खड़ा था और आत्मग्लानि के बोझ से धंसा जा रहा था।
वे दोनों प्रेम के मूरत किंकर्तव्यविमूढ़ हो कर एक दूसरे को देखे जा रहे थे,शायद विवशता को ऐसा ही मंजूर था। ग्लानि का सड़क बीतने के बाद अफसोस शेखर का इंतजार कर रहा था, कि क्यूं नहीं उसने दिया अपने प्यार को एक नाम, क्यूं नहीं वो दे पाया एक दायरा अपनी मोहब्बत को।खैर पूरी ज़िन्दगी बाकी थी उसके पास इस अफसोस से लड़ने के लिए सो उसने कॉल का बहाना बना हैलो कह कर चलता बना। इवा ने सोचा उसे रोकने का पर वो अपने रुंधे गले से उसे और संताप में नहीं डालना चाहती थी, दोनों की आंखें एक ही धार में बहे जा रही थी और महज अहंकार ने एक और प्रेम कश्ती को डूबा दिया।
भावविभोर शेखर ने अगले दिन status डाला-
जरूरी है आजकल वफा को दायरे में कैद रखना वरना,
इस जमाने में अहंकार अक्सर आजाद मोहब्बत के पर काट दिया करता है।।।।।
जहां एक तरफ ये पूरा संसार भविष्य की योजनाओं में लगा था वहीं एक तरफ अपने कर्म से विवश हुआ शेखर अपने भविष्य की फिक्र छोड़,पड़ा था अपने अतीत के तफक्कुर में।।।।।
-निकिता
अनायास अलार्म के बजने पर शेखर की नींद खुली,वो भी मिट्टी के भिनी खुशबू के साथ। हां,दिल्ली की भाग दौड़ से दूर शेखर 8 साल बाद छुट्टी में अपने जन्मज गांव आया था।वो गांव जहां उसने कितने सपने संजोए थे,अपनी ज़िन्दगी के कितने बेहतरीन पल गुजारे थे,वो नदी का किनारा,वो आम का पेड़ आज भी कितना साफ दिख रहा था शेखर के आंखों को जैसे कि ये सब कल ही हुआ हो।
अपनी पुरानी चीजें देखते देखते सहसा शेखर अपने किताबों कि दराज के पास पहुंचा,धूल की चादर ओढ़े वो किताबें कब से शेखर की राह देख रही थी। सबसे ऊपर थी इतिहास की किताब,सब किताबों से अलग और चमकीले पेन से उस पर नाम लिखा था ' इवा '।बस ये नाम काफी था वो सारी मीठी यादें उड़ेलने के लिए जिसे शेखर का मन आजतक नहीं भूल पाया था।वो शाम की चाय,जो वो दोनों साथ में पिया करते थे और कितनी खट्टी मीठी बातें किया करते थे।वो सारे ख्वाबों ने भी शेखर के मन को एक झटके में झकझोर दिया था जो इवा और शेखर ने साथ बुने थे,वो छोटा सा घर जिसके बगीचे में कमलतास के वृक्ष इंतजार करते रहते उन दोनों के गुफ्तगू के,एक बाइक और एक दूसरे के लिए ढेर सारा वक्त। फिर ना जाने क्यूं इस प्यार के सूर्य को नकारात्मकता का ग्रहण लग गया।आज भी तारीख याद है उसे 11 फरवरी,सब कुछ आम दिनों के तरह ही था,बस वो काली शाम के वो शब्द आज भी जब उसके मस्तिष्क में कौंधते है,तो पूरे तन में लहू आग सा दौड़ने लगता है।
इवा ने कहा था - " बस शेखर,मेरा मन अब तुमसे भर गया"
मन भर गया,अरे इंसान कोई वस्तु मात्र थोड़ी है जो मन भर जाए,शेखर आज भी वही बुदबुदा रहा था।बहुत प्रयास किए थे उसने इवा को वापस पाने के पर सब विफल रहे,वो कैसे समझाता उसे की इश्क़ कभी बासी नहीं होता।अगले दिन इवा की मां ने उसे वो इतिहास की किताब दी थी और कहा था," इवा चली गई"।
रोष और अहंकार में लिपटे शेखर ने किताब को देखा भी नहीं,आज वो किताब उस के हाथों खुली थी।अभी वो इवा को ग्लानि के सागर में डूबा ही रहा था कि एक कागज उस किताब से निकाल जमीं पर गिर पड़ा।शेखर ने जब उठाया तो देखा तो वो एक खत था शेखर के नाम पर,इवा का।
प्रिय शेखर,
मैं जानती हूं कि कल जो हुआ उस बात की तुम्हें बहुत वेदना होगी, पर तुम समझो मेरे लिए ऐसा करना आवश्यक था,ना मेरा तुमसे मन भरा है और ना तुमसे कोई गलती हुई है। शेखर,तुम कहां एक गगन में अपने ख्वाब लिए उड़ते उन्मुक्त युवक हो और मै यहां इतनी सरल और पाबंद सोच वाली लड़की।मै खुद को तुम्हारे काबिल नहीं समझती शेखर,पर तुम्हे ये समझाना बहुत जटिल होता,सो मैंने ऐसा किया।हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।
तुम्हारी इवा
खत में लिखे इवा के नाम को अभी तक शेखर के अश्कों ने सुशोभित कर दिया था।शेखर का मन उन्माद और प्रेम के अथाह समुद्र में गोता लगा चुका था।वो पागलों की तरह इवा को हर जगह ढूंढने लगा,और वो खुद से बातें करता," इवा पागल है,अरे भला जिस किस्मत पर इंसान भगवान से तर्क करने पे उतर जाता है,उस किस्मत का कर्णधार वो खुद को कैसे बना सकती है "।और कभी खुद को दोषी ठहराता की खुद की अहंकार पूर्ति के लिए उसने इवा को इतनी आसानी से जाने दिया।खैर,काफी जद्दजहद के बाद इवा का पता मिलने पर वो उस से मिलने गया।वैसा ही सरल मुख, वैसी ही निर्मल काया,बिल्कुल नहीं बदली थी इवा,शेखर ने बोलना चाहा - "ई...." लेकिन उसकी जुबान लड़खड़ा गई। आंखों ने ही तब तक काफी कुछ कह दिया था।वो सपने जो उसने पहले इवा के साथ देखे थे,आज फिर उसके मन में संजोए जा रहे थे।
तभी एक नन्ही आवाज़ सुनाई पड़ी -" मां,ये अंकल कौन है ",और एक 4-5 साल का बच्चा घर से बाहर निकला,काफी था ये 'मां' शब्द,शेखर के ख्वाबों के नवनिर्मित पुल को विध्वंस करने के लिए। अभी तक जो कारण इवा के आंखों को भीगा रहे थे,वो शायद शेखर तक पहुंच चुके थे,शेखर खड़ा था और आत्मग्लानि के बोझ से धंसा जा रहा था।
वे दोनों प्रेम के मूरत किंकर्तव्यविमूढ़ हो कर एक दूसरे को देखे जा रहे थे,शायद विवशता को ऐसा ही मंजूर था। ग्लानि का सड़क बीतने के बाद अफसोस शेखर का इंतजार कर रहा था, कि क्यूं नहीं उसने दिया अपने प्यार को एक नाम, क्यूं नहीं वो दे पाया एक दायरा अपनी मोहब्बत को।खैर पूरी ज़िन्दगी बाकी थी उसके पास इस अफसोस से लड़ने के लिए सो उसने कॉल का बहाना बना हैलो कह कर चलता बना। इवा ने सोचा उसे रोकने का पर वो अपने रुंधे गले से उसे और संताप में नहीं डालना चाहती थी, दोनों की आंखें एक ही धार में बहे जा रही थी और महज अहंकार ने एक और प्रेम कश्ती को डूबा दिया।
भावविभोर शेखर ने अगले दिन status डाला-
जरूरी है आजकल वफा को दायरे में कैद रखना वरना,
इस जमाने में अहंकार अक्सर आजाद मोहब्बत के पर काट दिया करता है।।।।।
जहां एक तरफ ये पूरा संसार भविष्य की योजनाओं में लगा था वहीं एक तरफ अपने कर्म से विवश हुआ शेखर अपने भविष्य की फिक्र छोड़,पड़ा था अपने अतीत के तफक्कुर में।।।।।
-निकिता
Wow......what a beauty this story relies upon.....well done buddy......keep growing
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